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'अछूत' मराठी के दलित लेखक दया पवार का बहुचर्चित आत्मकथात्मक उपन्यास है जो पाठकों को न केवल एक अनबूझी दुनिया में अपने साथ ले चलता है बल्कि लेखन की नयी ऊँचाई से भी परिचित कराता है।कथाकार दया पवार इस रचना के पात्र तथा भोक्ता दोनों ही हैं। इस उपन्यास में पिछडी जाति में जन्मे एक व्यक्ति की पीडाओं का द्रवित कर देनेवाला किस्सा भर नहीं है महाराष्ट्र की महार जाति का झकझोर देनेवाला अंदरूनी नक्शा है।कथाकार ने छुटपन से वयस्क होने की संघर्ष यात्राओं को बड़ी बारीकी से लेखनीबद्ध किया है। उसकी दृष्टि उन मार्मिक स्थलों पर अत्यन्त संवेदनशील हो जाती है जो आभिजात्य तया वादपरक आग्रहों के कारण उपेक्षित कर दिये जाते रहे हैं। यही कारण है कि इस रचना में वर्णित पिता मज़बूत इंसान समर्पित कलाकार पिसता हुआ गोदी मजदूर और ओछा चोट्टा सभी एक साथ हैं। माँ अत्यन्त अपमानजनक स्थितियों को नकारते हुए भी सभी कुछ को अनदेखा कर देती है। मित्रों पड़ोसियों और आर्थिक दृष्टि से विपन्न लोगों का जीवन कठोर होते हुए भी अत्यन्त रस रंग भरा है। राजनीति में ह्नास का वातावरण मौजूद रहते हुए भी उसकी समर्थक भूमिका खोजी जा रही है।अछूत साधारण लोगों की असाधारण गाया है। आद्यंत पठनीय तथा मन को भीतर तक छू लेनेवाली रचना।


10 thoughts on “Achhoot

  1. says:

    Most of readers would have just an overall idea of the dagru pawar's world but when you read his description of his own life then only one can feel various elements especially the conflicts and courageBest Line यह सतत बेचैनी ही मेरा स्थायी भाव है


  2. says:

    जाति नामक रोग से ग्रस्त हमारे समाज का बहुत ही सटीक चित्रण करा गया है | अपमान बहिष्कार और प्रताड़ना के कितने ही उदाहरण इस उपन्यास में हैं | पढ़ कर तैश आ जाता है | लेखक दया पवार ने सवर्ण तबक़े द्वारा निर्मित जाति व्यवस्था और उस से उपजी सर्वथा अनर्थकारी रूढ़ियों का बयान कैसे सीधे शब्दों में बिना कली फुँदने लगाए करा है |